रंगपाल की कृतियों में दिखती है माटी की सुगंध, प्रेम और सौहार्द की झलक
संतकबीरनगर के हरिहरपुर में गुरुवार को महाकवि रंग नारायण पाल जूदेव वीरेश रंगपाल की जयंती मनाई गई। मुख्य अतिथि सीडीओ बब्बन उपाध्याय ने कहा कि रंगपाल की कृतियों में माटी की सुगंध, प्रेम और सौहार्द की झलक दिखती है।
जयंती पर राष्ट्रीय एकीकरण तथा पाल सेवा संस्थान के तत्वावधान में कार्यक्रम आयोजित किए गए। महाकवि के जन्म स्थली पर संगोष्ठी के साथ फाग व चैता का रंग छाया रहा। सीडीओ डॉ. बब्बन उपाध्याय ने कहा कि रंगपाल की कृतियां देश में ही नहीं विदेशों में सराही गई। उनकी फाग रचनाएं होली के मौके पर देश में नहीं बल्कि विदेशों में गाई और सुनाई जाती हैं।
गांव की मिट्टी से उठकर पूरे जनमानस पर अपनी रचनाओं के माध्यम से अमिट छाप छोड़ने वाले तमाम कवियों में रंगपाल ऐसे कवि हैं जिन्होंने माटी की महक को देश के साथ विदेशों में बिखेर कर नाम रोशन किया। उन्होंने कहा कि उनकी रचनाओं को जिलाधिकारी के माध्यम से सांस्कृतिक विभाग द्वारा सहेजा जा सकता है।
रंगपाल की यादों को संजोने की जरूरत
सूर्या इंटरनेशनल एकेडमी के एमडी डॉ. उदय प्रताप चतुर्वेदी ने कहा कि रंगपाल की कृतियों और उनसे जुड़े साज समान को सांस्कृतिक धरोहर बनाने की जरूरत है। ब्रज भाषा मे रचनाएं लोक साहित्य की अमूल्य धरोहर है। रंगपाल के रचित झूमर तो जनमानस में इस तरह रच बस गया कि डेढ़ सौ वर्ष बाद भी रंगपाल के ही गीत गांव-गांव फाग के रूप में सुने व सुनाए जाते है। फागुनी गीत की मिठास बरबस ही लोगों का ध्यान आकर्षित कर लेती है।
भूल गए पुरानी परंपरा, मर्यादा और संस्कृति
अध्यक्षता कर रहे सेवानिवृत्त शिक्षक राम भरोस पाण्डेय ने कहा कि हरिहरपुर के रहने वाले महान कवि रंगपाल अपने ही जिले में उपेक्षित हैं। पुरानी परंपरा, मर्यादा, संस्कृति सब भूलकर हम नई संस्कृति में जा रहे हैं। जो अपने मातृभूमि के साथ धोखा है। हिंदी साहित्य में उनका बड़ा सहयोग रहा। रंगपाल के फागों में कल्पना की उड़ान के साथ ही भाषा के सौंदर्य रस का अद्भुत समन्वय मिलता है।
समाधि स्थली की मरम्मत और संग्रहालय बनाने की जरूरत
पाल सेवा संस्थान के अध्यक्ष बृजेश पाल ने कहा कि रंगपाल जी की समाधि स्थली जो कष्टहरणी नदी स्थल पर है। काफी जीर्ण शीर्ण अवस्था में है। मरम्मत कराने के साथ ही संग्रहालय बनाने की जरूरत है। कार्यक्रम पूरी तरह फागुनी मय बना रहा। इस मौके पर एक दूसरे को गुलाल लगाकर फागुन का स्वागत किया।